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Rajiv Sachan, Jagran


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जैसी कांग्रेस-वैसी भाजपा

Posted On: 28 Jun, 2011  
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जैसी कांग्रेस-वैसी भाजपा

Posted On: 28 Jun, 2011  
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सीजर की पत्नी का एतराज

Posted On: 28 Dec, 2010  
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वंशवाद की निर्लज्ज राजनीति

Posted On: 12 Oct, 2010  
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फैसले पर कुतर्कों की बौछार

Posted On: 5 Oct, 2010  
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Posted On: 1 Apr, 2010  
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कांग्रेस का नया कार्यक्रम विवाह पूर्व यौन संबंधों पर अवधेश कुमार की टिप्पणी बच्चन परिवार को अवांछित करार देने के कांग्रेस के कृत्य को घटिया राजनीति बता रहे हैं राजीव सचान कांग्रेस का नया कार्यक्रम संबंधों पर सवाल यह लज्जास्पद ही नहीं, बल्कि घृणास्पद भी है कि देश का नेतृत्व कर रही कांग्रेस देश-दुनिया की समस्याओं से जूझने की बजाय यह सुनिश्चित करने में लगी हुई है कि हिंदी फिल्मों के अप्रतिम अभिनेता अमिताभ बच्चन और उनके परिवार को कैसे अपमानित और लांछित किया जाए? यदि कांग्रेस महज एक राजनीतिक दल के रूप में ऐसा क्षुद्र आचरण कर रही होती तो उसका किन्हीं तर्को-कुतर्को के साथ बचाव किया जा सकता था, लेकिन आखिर कांग्रेस शासित केंद्र एवं राज्य सरकारें किसी भारतीय नागरिक को अवांछित कैसे घोषित कर सकती हैं और वह भी तब जब उस नागरिक का नाम अमिताभ बच्चन हो? कांग्रेस को अमिताभ से असहमत होने और यहां तक कि उनका विरोध करने का अधिकार है, लेकिन उसके मंत्री और मुख्यमंत्री उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार कैसे कर सकते हैं? क्या अमिताभ बच्चन देशद्रोही हैं? यह संभव है कि कांग्रेस की ओर से जो राजनीतिक तुच्छता दिखाई जा रही है उससे अमिताभ बच्चन की सेहत पर फर्क न पड़े, लेकिन यह तथ्य आम भारतीयों को ग्लानि से भर देने वाला है कि विनम्र-विद्वान छवि वाले मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए आम कांग्रेसी नहीं, बल्कि उसके मंत्री-मुख्यमंत्री देश के सबसे लोकप्रिय अभिनेता की बेइज्जती कर रहे हैं? कांग्रेस अपने ऐसे आचरण के जरिये एक तरह से यह कहने में लगी हुई है कि आओ, हमसे सीखो कि अमिताभ बच्चन जैसे शख्स को कैसे बेइज्जत किया जा सकता है? यह सही है कि अमिताभ गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर बन गए हैं, लेकिन क्या यह कोई गुनाह है? क्या गुजरात देश के बाहर का कोई ऐसा हिस्सा है जहां से भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जा रही हैं? हालांकि अमिताभ स्पष्टीकरण दे चुके हैं कि वह गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर हैं, नरेंद्र मोदी के नहीं, फिर भी अनेक लोगों को उनका फैसला रास नहीं आया है और वे उनकी आलोचना कर रहे हैं। इस आलोचना में कोई बुराई नहीं, बुराई इसमें है कि महाराष्ट्र, दिल्ली की सरकारों के साथ-साथ केंद्रीय सत्ता के प्रतिनिधि अमिताभ बच्चन को अवांछित बताने का काम कर रहे हैं। चूंकि अशोक चव्हाण के साथ-साथ कांग्रेस के एक प्रवक्ता साफ तौर पर कह चुके हैं कि सरकारी कार्यक्रमों में बच्चन की मौजूदगी मंजूर नहीं है इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि बिग बी को अपमानित करने का फैसला कांग्रेसी सरकारों का नीतिगत निर्णय है। दिल्ली में आयोजित अर्थ ऑवर शो प्रतीकात्मक ही सही, एक बड़े उद्देश्य के लिए था। कांग्रेसजनों को इस शो के ब्रांड एम्बेसडर अभिषेक बच्चन के पोस्टर हटाने अथवा हटवाने के पहले इस पर लाज क्यों नहीं आई कि कम से कम ग्लोबल वार्मिग के प्रति आम जनता को जागरूक बनाने के इस कार्यक्रम में संकीर्णता दिखाने से बचा जाए? अर्थ ऑवर शो में हुए अनर्थ पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की इस सफाई पर आश्चर्य नहीं कि उन्हें नहीं पता कि अभिषेक इस कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर हैं। चूंकि बच्चन परिवार की बेइज्जती का कांग्रेसी कार्यक्रम शासनादेश जारी कर नहीं चलाया जा रहा इसलिए शीला दीक्षित को झूठ का सहारा लेना पड़ा। इसके पहले अमिताभ के भय से जयराम रमेश बाघ बचाओ अभियान के कार्यक्रम से गायब रहे। कम से कम ऐसे कार्यक्रमों को तो घटिया राजनीति से दूर रखा ही जा सकता था। बीते दिनों कांग्रेस के आग्रह के बावजूद मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने गांधी नगर में उस समारोह में शिरकत की जिसमें नरेंद्र मोदी भी थे। क्या अब कांग्रेस उनका भी अमिताभ बच्चन की तरह विरोध करेगी? बेहतर होगा कि कांग्रेस बच्चन परिवार को कानूनी रूप से अवांछित घोषित करा दे। तब कम से कम कांग्रेसी नेता अमिताभ-अभिषेक से कन्नी काटने के लिए झूठ का सहारा लेने से तो बच जाएंगे। माना कि कांग्रेस को नरेंद्र मोदी से चिढ़ है और वह उनके साथ खड़े होने वालों को भी बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं, लेकिन क्या इस तथ्य को झुठला दिया जाए कि वह भारत के एक प्रांत के मुख्यमंत्री भी हैं और उन्हें ठीक उसी तरह लोगों ने चुना है जैसे शीला दीक्षित और अशोक चह्वाण को? क्या अब कांग्रेस अमिताभ बच्चन की तरह रतन टाटा, मुकेश अंबानी आदि को भी अवांछित करार देगी, क्योंकि ये दोनों न केवल गुजरात में भारी निवेश कर रहे हैं, बल्कि मोदी की तारीफ भी कर रहे हैं? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं) शादी के पूर्व यौन संबंध या बिना शादी के साथ रहने पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां निश्चय ही देश के एक प्रभावी वर्ग की भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली हैं। सामान्य तौर पर यह तर्क किसी को भी गलत नहीं लगेगा कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से यौन क्रिया करते हैं या साथ रहते हैं तो इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए। अपराध तभी होगा जब दोनों में से किसी एक पक्ष ने जोर-जबरदस्ती किया है। इसलिए यदि उच्चतम न्यायालय की पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील से यह पूछा कि इसमें अपराध कहां है तो उसे असामान्य रवैया नहीं कहा जा सकता। उच्चतम न्यायालय पहले ही लिविंग रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दे चुका है। यही नहीं उच्चतम न्यायालय निजता के दायरे में वयस्क समलैंगिकता को भी गैर कानूनी मानने से इनकार कर चुका है। वास्तव में उच्चतम न्यायालय का मौजूदा रुख इन दोनों फैसलों का ही अगला चरण है। उच्चतम न्यायालय के सामने यह मामला तमिल अभिनेत्री खुशबू द्वारा पांच वर्ष पूर्व दिए गए एक साक्षात्कार के कारण आया जिसमें उसने शादी के पूर्व सेक्स का समर्थन किया था। उसने एक पत्रिका को साक्षात्कार देते हुए कहा कि शादी पूर्व यौन संबंधों में कोई बुराई नहीं है, लेकिन ऐसा करते वक्त सावधानियां बरतनी चाहिए। उसका यह भी कहना था कि शिक्षित युवा द्वारा अपनी पत्‍‌नी से कौमार्य की उम्मीद करना भी पुरातनपंथी विचार है। उसके बाद खुशबू पर अलग-अलग न्यायालयों में 22 मुकदमे किए गए। खुशबू के बयान के बाद क्या देश के माहौल में कोई अंतर आ गया? क्या उसके बयान के बाद किसी माता-पिता ने यह शिकायत की कि उनकी लड़की/लड़का उसके कारण घर छोड़कर चले गए या गलत रास्ते की ओर मुड़ गए? न्यायालय के अनुसार यदि ऐसा कोई वाकया सामने नहीं आया तो आप कैसे कह सकते हैं कि इस प्रकार के बयान से समाज का वातावरण बिगड़ता है। जाहिर है, इन प्रश्नों का कोई संपुष्टकारक उत्तर नहीं हो सकता। इसलिए न्यायालय में इस मामले का हस्त्र बिल्कुल साफ है। किंतु इस पर विचार करने का दूसरा दृष्टिकोण भी हो सकता है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि खुशबू अपने वक्तव्य में गलत थी या सही? किंतु जो चीज कानूनी रुप से सही हो, आवश्यक नहीं कि समाज उसे स्वीकार कर ले, वह समाज की कसौटियों पर भी सही हो, नैतिक भी हो या उसका कोई दुष्परिणाम न आए। न्यायालय द्वारा लिविंग रिलेशनशिप संबंधी फैसले का केवल एक अल्पसंख्यक वर्ग ने ही स्वागत किया। न्यायालय के आदेश के खिलाफ यद्यपि अपने देश में सार्वजनिक तौर पर प्रतिक्रिया देने की मानसिकता नहीं है, पर यदि आज भी सर्वेक्षण किया जाए तो बहुसंख्य समाज इसे स्वीकारने को तैयार नहीं है। समलैंगिकता वाले फैसले को तो उतने बड़े वर्ग ने भी स्वीकार किया। यही बात खुशबू मामले में न्यायालय के वर्तमान मंतव्य पर भी है। इसमें भी एक माननीय न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की कि नैतिकता या अनैतिकता को आप अपराध के दायरे में कैसे लाएंगे? निस्संदेह, इन्हें कानूनी तौर पर अपराध के दायरे में नहीं लाया जा सकता। लेकिन यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नैतिकता के बंधनों का अंतिम उद्देश्य समाज को सुगठित रखना और जीवन गतिविधियों को सुचारु रुप से संचालित करना ही है। न्यायायलय ने भी नैतिकता को अनावश्यक नहीं कहा है। कानून एवं न्यायालयों की सामाजिक जीवन के मामले में सीमाएं स्पष्ट हैं। इनसे समाज की सामूहिक सोच को बदलना संभव नहीं है। समाज की सोच कानून से नहीं, पंरपराओं से प्रभावित है। कानून की सजा का भय जानते हुए भी समाज परंपराओं के आवरण में अपराध कर बैठता है। इसलिए आवश्यकता संतुलित समाज सुधार अभियानों की हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) क्या गुजरात का ब्रांड एम्बेसडर बनना गुनाह है? क्या यह देश के बाहर का कोई ऐसा हिस्सा है जहां से भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जा रही हैं? कानून की सामाजिक जीवन में सीमाएं स्पष्ट हैं समाज की सोच कानून से नहीं, पंरपराओं से प्रभावित होती

Posted On: 1 Apr, 2010  
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सुधी पाठक

Posted On: 23 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 6 Jan, 2010  
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इंडिया का पीएम कौन

Posted On: 6 Jan, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजीव जी नमस्कार राजीव जी एक बात मेरी समझ नहीं आती की हम प्रधान मंत्री पर उंगली क्यों नहीं उठा सकते और क्यों उनसे सवाल नहीं कर सकते इसलिए की वो एक सज्जन पुरुष है और उनका दामन पाक साफ है मान लीजिये आपके पडोसी के यहाँ चोरी हुई और उस समय आप घर पर थे चोरी होने पर घर में उठा पठक हुई होगी जैसे ताला तोडना सामान इधर उधर फेकना क्या इतना सब आपके पड़ोस में होता रहा और पुलिस आपसे सवाल भी न करें क्योकि आप एक सज्जन पुरुष है ऐसा तो हो ही नहीं सकता न, जवाब तो आपने देना ही होगा और यह भी बताना होगा की आपने चुपचाप यह सब क्यों हो जाने दिया क्यों आवाजें आने पर आपने अन्य पड़ोसियों को इतल्ला करना मुनासिब नहीं समझा जिससे न केवल चोर पकडे जाते बल्कि चोरी की घटना भी नहीं होती ! हमारें मन में तो यही सवाल है अब सच क्या है ये तो प्रधान मंत्री जी जाने ! अगर यह सही है की प्रधान मंत्री पर उंगली उठाना गलत है तो यह भी सही है की जितने बड़े घोटाले उनके मंत्रित्व काल में हुए सीमाओं से परे है और जनता उन्हें इसके लिए कभी माफ़ नहीं करेगी चाहे सरकार किसी की भी हो ! आशुतोष दा

के द्वारा:

राजीव जी सादर प्रणाम । मैं यह तो नहीं कहता कि मैं सुधी पाठक हूं लेकिन पिछले डेढ़ दशक से मैं जागरण सिर्फ उसका संपादकीय पढ़ने के लिये ही खरीदता हूं और जब कोयी लेख या संपादकीय मुझे पसंद आता है तो वह मेरी फाईल मे चला जाता है । जागरण के संपादकीय पृष्ठ से मुझे पत्रकारिता के संस्कार मिलते हैं । मेरी मजबूरी है कि मुझे जागरण के संपादकीय के अलावा और किसी अखबार का संपादकीय अच्छा नहीं लगता लेकिन जागरण अखबार मेरी खबरों की भूख को शांत नहीं कर पाता है इस कारण मुझे इससे थोड़ी निराशा होती है । विज्ञापनों के बढ़ते आकार ने खबरों का गला घोंट दिया है । राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय खबरों वाले पन्नों पर ही अधिक्तर विज्ञापनों की गाज गिरती है और तमाम रोचक खबरों से हाथ धोना पड़ता है । विज्ञापन किसी भी अखबार के लिये प्राणवायु होते हैं लेकिन हम खबर पढ़ने के लिये अखबार खरीदते हैं और जब वे नहीं मिलतीं तब घोर निराशा होती है । . इधर डेढ़ दो महीने से आपके लिखे लेखों ने सड़ते गंधाते यूपीए के तलाब के ऊपर की काई को छांटा है । कामनवेल्थ और टू जी स्पैक्ट्रम के मुद्दे पर आपके लेखों ने यूपीए और पीएमओ की कलई उतार दी है । गणेश शंकर विद्यार्थी को मैंने नहीं पढ़ा है लेकिन वे निश्चित ही आपकी तरह लिखते होंगे । आपका यह तेवर पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये एक मिसाल है । जय भारत ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

के द्वारा:

rajivji aap ka kaha sahi hai pahaley hamrey desh meie prime minister ki waqut hoti thi woh party ka mohara nahi hota tha per mere chand alfzon meie yahi kahana chaunga ki mmsingh sahab vaisey to samjhdar hain personalty wale insaan hain per yahan unhoney puri samjhadri ki daad di hai jaub bhi kuch hota hai jo galat hai unko sahaney ssath party ki mukhiya ko galat anubhi karar dedp aur sahi jo ho pura ka pura matter p.m.ko do per nahin woh baat party apney upper leyleti hai p.m. to kewal ek part minister hai ussey kah zaroor lo woh p.m.hai bahut si baaton ko jab p.m.ko soniyaji se puch kar karna padta hai woh sochtey hain bhai p.m.maie per kaam unka woh khud aaj tak nahin samajh paaye becharey siddhey saadhey p.m.hain sayad aagey aaney wale 100 years meie aisa p.m.hindustan ko milna muskil hai jab kabhi usko yeh kahana padta hai ki jab koi chhaey p.m.kursi unkey naam hai maie to khali isski bharpayi kar raha hoon jaise mahabharat kal meie dhrasthar to mukhiya tha per raj duriyodhan ka tha desh meie bachey hi nahin jaaantey desh ka p.m.kaun hai pura naam kisi ko nain pata han yeh zaroor unhey malum hai unke naaam mms lagu hota hai yah p.m.bhi soch rahey hain yah kya bala hai issliye unko ab apni pechan baani hai woh ab ki punjab jakar waheguru ke aageymattha takekar apni bhul ki maafi maang kar apni sahi pechan bannaey gey jis jaan sake iss desh ke log p.m.bhi hamarey desh meie hota hai aur ek p.m. ke rahtey dusrey ko abhi saamney nahin aahi aana chhaiye issliye ab unke kaam meie koi dakhal andazi nahi karey ab unhoney apney virodhiyon ko issra kardiya unki party ko samay samaay per yaad diltey raheyin ki deshka p.m.respect sardar manmohan singhji haain inko hi humney lalquiley per aisa kahtey sunna tha meehangi ghateney meie woh saksham nahi hain han pertol diesel ke daam badney ho tab woh woh zaroo isko lok sabha se ek baar meie pass kara dengey aisi hi mehangai mei p.m.sahab ne sabhi lok sabha members ki salary badbai hai jab bhi aagey koi bhul jaaye tab virodhi unko iss baat ke liye namaskar karaangey koi p.m.asia to aaya desh ka nahin lok sabha ke memberon ka neta hai jisney unka dookh dard daamjha party ki mukhiya per car naahin hai kamsekam unko sarkari gaadi ek do aur milljaye areey desh meeie nahon kam se kam party meie to sudhar ho jaye jai .p.k. ki

के द्वारा:

आदरणीय सचान जी बधाई सच कहने पर - वैसे तो आपके बहुत से लेख जागरण में पढ़ने को मिलते रहते है - यह तो सर्विदित है स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारतीय में (समाज की सच्चाई भी यही है की) सारे पेशे खानदानी ही थे गरीबो में आज भी विद्धमान है नाई का बेटा नाई, मोची का बेटा मोची, स्वीपर का बेटा स्वीपर तक ही सिमित है अगर वह पढ़ लिखकर कोई नौकरी न पा जाय--- वर्तमान में जितने लोग राजनीती में है वह या तो खानदानी विराशत, पैसा , या फिर दबंगई के बल पर राजनीती में है - कोई सामाजिक सेवा के बल पर नेता नहीं बने है - इसलिए राहुल गाँधी का युवाओं को राजनीती में आने का आव्हान करना एक साहसिक कदम है और बाकी सभी पार्टियों को भी ऐसा ही कारन चाहिए -- क्योंकि खानदानी विराशत के बल पर राजनीती करना देश के लिए बहुत ही घातक है यह लोकतंत्र न होकर राजशाही की श्रेणी में आता है -- आप तो स्वयं पत्रकार है और रोज ही देख रहे होगे की उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में कैसे - कैसे खेल हो रहे परिवार-वाद का नंगा नाच हो रहा है

के द्वारा:

mujhe kuch jayada nahin kahan bas itni si baat hai purey desh ki awaz court ke fasiley ki awaz hai kisi ke pass itna time nahi aaps meie ladai karey kisi ke ghar meie aag lageygei to apna ghar bhi jalega desh ke netao ko to janta ke ghar jaley apni roti sikni chhaiye hart rarf ek awaz hai hindu muslim bhai bahi per ab yeh kya kareine inkey haath se baazi nikal gayi ram rahim phir ek hogey aaj ka yuv itna gira hua nahin dosti ko dushmani dharm ke naam per ladey haan mulyam singh, jaise neta ki roti khoti ho gayi na hindu ke rahey na muslaman ke mere vichar se itna hi sahi hai court ke fasiley ko jo mila hai swikar hua woh hi desh ki ekta akhandta ka sahi swroop hai koi iss ko tudvaney ki pahal karey usko ab karara jawab dijiyey mere vichar yahi hain1992 meie congress ne iss per aag lagyi thi tab desh ke nawjawano ne kya purey desh ke hinduo ne thhana tha ab iss masley ko samapt hona chhaiye aur jo2010 meie ek prakar se samapt ho gya muslim bhai bhi iss fasiley se santusht hain jo bhi hua ussey sahi tahrey se govt.ko nivtana chhaiye yahi desh ko duniya ke aagey apni swantarta ka sahi mayno meie deshwasi ek acha paricy dey payengey kinhi galat dharnaowaley netao ko jo ashanti paida kar rahey hain jativad aur dharm ko aadmeie ley kar desh meie aag laga leney ki koshish kar rahey hon unko shant kardein desh ek hai hai isko ek raheney dein yahi har hindustani ki awaz haijo darr aam desh meie paida kiya gaya ussey hi desh ka har nagrik samajh gaya ab sab ko ek rahana netaon ke bhadkavey meie nahin aana hai kaun desh ke savindhan ka sahi palan karta hai isko desh ki janta ne ek awaz se bata diya court ka faisla hi sahi hai yah desh ke un netao per ek kuthraghat laga jinhoney asia socha tha unke byan aatey desh meie aag lag jayegi per yeh to ulta ho gaya unkey gaal per tamacha pad gaya ki unki baat ko muslim bhaiyon ne bhi swikara ne ki bajaye nakar diya yeh desh ki janta ka sahi jawab hai ki hum iss prakar thik hain mat lado mandir masjid ke naam per roti seko ab kis kaam per mehangi hi hatvado iss baat per

के द्वारा:

rajivji mai apke stambh ka niyamit pathakhu.Apne bilkul sahi likha hi manmohan singh jis tarahpradhan mantri bane hai usse to yahi lagata hi ki unhe yah pad na to Sonia Gandhi ki vajah se mila hai na hi unki kabiliyat ki vajahse,isake peeche sirf aur sirf America hai shayed isi liye Ameriki hito ki rac\\\\\\\\\\\\\\\\kcha ke liye apni kurbani dene me bhi peeche nahi hat sakte.Ise bar bar unhone sabit bhi kiya hai,bat chahe parmadu urja se sambandhme ho ya unke pichale vitta mantri ka karyakal ho jab yahi manmohan 10 janpath ka rasta hi bhul gaye the,akhir Nehru gandhi khndan jo apne virodhiyo ko kabhi chama nahi karta,manmohan singh ke mamle me majburi me hi manjur kar sakata hai.ise bar bar apni Ameriki hito ki rakcha me desh ko girvi rakh rahe hai.B.T.bagan ko kanun bana kar thopa ja raha hai.Nahi to ye kuon si bat huyi ki ek loktantric desh me B>T> fasalo ki alochanko apradh ghosit kar alochako ko jailki saja ka pravidhan kiya jai.kya is desh me manmohan emerjency lagaige kya hindustan ki janta ne isi liye itani kurbani di thiki hamare desh ka pradhan mantri oxford me angrejo ka gudgan karega ki angrejo ne hi hame sabhyata aur vikas karane ki prerada di.congress to chaplusi ki champian hai aj se nahi indira gandhi ke jamane se hi.Apko yad hi hoga jab loksabha me hokey mach jitane per kisi congresiki tippadi thi ki yah Indira ji ki nitiyo ki jeet hai.,ya tatkalin congress ke adhyakch ka bayan ki INdira is india.Abhi Rahul gandhi ke pradhan mantri ke sawal per 10 janpath ki fatakar ke bad bhi inhe sharm nahi ayi.Manmohan kepradhan mantri ka pichala karyakal to rajya sabha ke pichale durwaje ki bat mani ja sakati hai ,lekin is chunaw me to sari naticta bhul ker pichale durwaje se ayemanmohanko pradhanmantri ko umidvar ghoshit ker ke chunaw me utara gaya.,koi kahane wala nahi tha ki madom ji pahalemanmohan ko tikat to dijiye fir utarie madan me kya hamara samvidhan ki yahi maryada hi ki koi videshi is desh ka pradhan mantri ho sakata hi lekin agar isi desh ka koi nagrik dalit se shadi karne ke bad bhi dalito ko milane wale labh se va\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\banchit ho jata hai.NIsh chit hi agar aj GAndhi yaBHagat singh jinda hote to ya to in bhrasht acharad ke khilaf apne tarah se ladte ya janta se chama yachana karate ki kiske liye janta se kurbani magi gayi thi.

के द्वारा:

मनमोहन सिंह जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो मीडिया में उनकी ईमानदारी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। लेकिन अब तक कि उनकी कार्यशैली यही बताती है कि वह पूरी तरह सोनिया जी के मुखापेक्षी हैं। इसकी वजह भी है। उनके ऊपर विरोधी यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह नगपालिका के कारपोरेटर तक का चुनाव नहीं लड़े। जनता के द्वारा सीधे निर्वाचित होने के बजाय उन् पर आलाकमान की राज्यसभा सांसद के रूप में कृपा हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में प्रणव मुखर्जी भी हैं। उन्हें इंदिरा जी के साथ भी काम करने का मौका मिला लेकिन मौजूदा पार्टी नेतृत्व का वह विश्वास नहीं जीत सके। कांग्रेस के लोग यह भलीभांति जानते हैं कि उन्हें वोट तो सोनिया जी के भरोसे ही मिल सकता है,इसलिए पार्टी के कामकाज से लेकर सरकार की कार्यप्रणाली में भी सोनिया जी ही मुख्य धुरी हैं। एक प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह जी की जो हनक दिखनी चाहिए वह नहीं दिखती। सचान जी ने आपने सही कहा है कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी भी प्रधानमंत्री की आलोचना से बचती है। महंगाई का ही मुद्दा लें भाजपा ने इस पर प्रधानमंत्री के बजाय शरद पवार को ज्यादा घेरने की कोशिश की। अतीत का यह अनुभव रहा है कि विपक्षी दल महंगाई जैसे मुद्दे पर सरकार को घेरता था लेकिन विपक्षी दल भाजपा के तेवर जनता का मन मोहने वाले नहीं हैं।

के द्वारा:

प्रिय राजीव जी, मैं भी काफी समय से आपके इस स्तम्भ का पाठक हूँ, और एक जिम्मेदार नागरिक एवं बुद्धिजीवी होने के कारन अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराना आवश्यक मानता हूँ. मेरा मानना है कि पिछले काफी सालों से हमारे देश मैं एक पद रक्त चला आ रहा है और जो भी इस पद पैर आया भिन्न -२ मदारियों ने उसे बन्दर कि तरह नचाया . मनमोहन सिंह के बारे मैं कुछ नहीं कहा जा सकता, वह भी उसी राजनीती का एक हिस्सा हैं.हम ख़राब हो चुके फलों मैं से कम ख़राब फल ढूंढ कर चुन रहे हैं.राहुल गाँधी गरीबों के मसीहा बन कर उभरे हैं और रोजाना उनके द्वारा एक naya keertimaan sthapit hota hai . गरीबों के यहाँ रात्रि विश्राम करना , उनके साथ खाना पीना अच्छी बात है , लेकिन और अच्छा होता कि वह उनसे पूंछते कि एक दिन कि कमाई में उसके घर के कितने लोग खाना खा लेते हैं और कितने भूखे सो जाते हैं, शरद पंवार साहेब को ज्योतिष का कौर्स क्यों नहीं करा de te . वैसे तो ये सरकार रहने के लायक है या नहीं इससे बड़ा सवाल यह है कि सरकार है भी या नहीं

के द्वारा:

राजीव सचान जी, मै दैनिक जागरण में नियमित रूप से आपका स्तम्भ पढता हूँ और आपके प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के बारे में इस नजरिये से भी मै बिलकुल सहमत हूँ| दरअसल आज कल हमारे सभ्य समाज में भी कुछ ऐसे बुध्हिजीवी आ गए हैं , जो बिना विश्लेसन किये अपना नजरिया प्रकट कर देते हैं जो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता है, ऐसे ही तथाकथित बुध्हिजिवी ऑक्सफोर्ड से पढ़े मनमोहन सिंह जी की बड़ाई करते फिरते हैं जिन्होंने ना जाने कितने ही अमर्दायित बातें कहीं हैं | और इनके मंत्रियों का तो कहना ही क्या जो बिना सर पैर के बातें कहते रहते हैं, हाँ कुछ निष्ठापूर्वक काम करने वाले भी हैं, जैसे चिदंबरम जी... अंततः मै कहना चाहूँगा की मै आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ, ऐसी बात हमारे प्रधानमन्त्री ना जाने कितनी बार कह कर अपने देश को शर्मिन्दा कर चुके हैं |

के द्वारा:




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